मैं झरना हूं …
अरुण तिवारी
यहां बिंदु है, वहां सिंधु है,
सिंधु-बिंदु के मध्य तैरते जलद ग़ज़ब हैं।
कुछ ताप बढ़ा, कुछ पवन चली,
बरस उठी कोटिश अली,
भूधर ने बाजू फैलाई,
कुछ बांह सजी, कुछ लहर बनी,
कुछ ने नापी अंतस गहराई।
फिर मन डोला, इक किरण दिखी,
उल्लास विकल दल वेग बना,
झर झर कर सब फूट पड़ी,
तब झरने सा शीतल नाम पड़ा।
मैं झरना हूं।
न कुछ सोचा, न जाना अभी,
भूधर ने नीचे ठेल दिया,
राह ठोकर कहीं गिरा धड़ाम,
मोड़ा तोड़ा भी मुझे बहुत,
चल पड़ा जिधर भी मार्ग दिखा,
यात्रा सतत् औ अविराम।
इस बीच मिला समतल तल था,
जैसे जीवन ही ठहर गया,
मज़ा तो झर झर झरने में,
मैं दौड़ पड़ा फिर वेग बना,
सीढ़ी सीढ़ी मैं उतर गया।
मैं झरना हूं।
कुछ ताप बहुत, कुछ बोझ अधिक,
मिली अविकल इक मुरझाई कली,
देख मुझे खिलखिला उठी,
गट्ठर फेंका, अंजुरी बांधी,
प्रेम पगी दृष्टि साधी,
फिर ओंठों से मेरा पान किया,
चन्द्र चकोरी मुख स्नान किया,
वह सींच रही थी खुद को पर
उसने मेरे अंतस को सींच दिया,
पर मैं उधर नहीं वह जिधर चली,
मज़ा तो झर-झर झरने में,
मैं झरना हूं।
कोई थकित मिला, कोई चकित मिला,
कहीं मिली सूखी वन झाड़ी,
खाल-ताल कहीं बिल्कुल खाली,
देख नहीं आंखें मिची,
मैने सबक लिया औ सींच दिया।
सौभाग्य बड़ा जो काम किसी के आया मैं
उनकी खुशी वल्लरी हरियाली,
हरित मेरी मन प्राण सुधा,
झर झर झरते कई यार मिले,
हम नदी बने, फिर सिंधु बने, फिर बिंदु बने
रहता ऐसे ही जीवन सरस मधुर।
मैं झरना हूं।

रचनाकार संपर्क amethiarun@gmail.com {9868793799}
One thought on “मैं झरना हूं …”
Beautiful lines sir.